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Thursday, 21 March 2013

मैंने जीना सीखा

इस जीवन से लड़कर मैंने इस जीवन को जीना सीखा,
ग़म को मुस्कान भरी इन आँखों से हँसकर पीना सीखा।

आदत सी पड़ गयी लबों को जब झूठी मुस्कानों की,
तब इन होंठों ने जाने कब जी भर करके हँसना सीखा।

दुःख दुःख न रहे सुख बन बैठे, दर्दों ने खुद को झुठलाया,
जबसे हँसकर इन दर्दों के आँचल में ही सोना सीखा।

है प्यार मिला इतना जबसे, झोली कम सी पड़ जाती है,
सब तुझको खुद अर्पण करके, सर्वस्व यहीं पाना सीखा।


इस जीवन से लड़कर मैंने इस जीवन को जीना सीखा,
ग़म को मुस्कान भरी इन आँखों से हँसकर सीना सीखा।

Wednesday, 16 May 2012

अंतर्द्वंद

चाहत है मेरी चलने की इस दुनिया के संग|
कार्य करू सामाजिक, बनकर इसी विश्व का अंग|
जितना ही लोगों के मन के अधिक निकट जाती हूँ
उतना खुद को भरी भीड़ में एकाकी पाती हूँ|
कहते हैं सब मैं लोगों से बातें कम करती हूँ|
सबके मन की सुन लेती, खुद की कुछ ना कहती हूँ|
अपने दिल की खुद से कहकर जो सुकून है पाया
उस दिल के अपनेपन को कोई समझ कहाँ है पाया|
शब्द नहीं हैं उतने, जितने भाव हैं मेरे मन में|
खुद ही खुद की सुन पाऊं, काफी है इस जीवन में|
कभी मैं कुछ कहती हूँ, कुछ कहती है मेरी छाया|
मैं कहती हूँ सच है वो कहती है सब है माया|
हैं जो रिश्तों के ये बंधन, अपने और पराये|
कोई इनके मोह-पाश से कैसे बचकर जाए?
कभी कभी द्वंदों में फंसकर खुद को बहुत है कोसा|
छाया की बातों पर, या फिर खुद पर करूँ भरोसा?
छाया भी तो मेरे मन की बातें ही कहती है|
मेरे ही मन के छोटे से कोने में रहती है|

Thursday, 2 February 2012

मेरे सपने

नन्हीं बच्ची बचपन में परियों की कहानी सुनती है.
उसका होगा राजकुँवर एक स्वप्न सुनहरे बुनती है.
छोटे छोटे उसके सपने पूरे भी हो जाते हैं.
जो उसके परिवारजनों को अद्भुत सुख दे जाते हैं.
पर बचपन से परीकथाएँ मुझे लुभा ना पाई हैं.
सदा वीर गाथाओं ने आँखों की चमक बढाई है.
कर्ण, विवेकानन्द, शिवाजी औ सुभाष बस गए जहाँ.
उन मेरे विशाल स्वप्नों में राजकुँवर का स्थान कहाँ.
सपने देखे ऊँचे ऊँचे, आसमान तक जाने के.
बड़े बड़े नामों के संग अपना भी नाम बनाने के.
जैसे जैसे बड़े हुए और खुद को सक्षम पाया.
कुपित नियति ने तब विरोध में अपना खेल दिखाया.
ऐसी मिली चुनौती कि सपनों ने साथ ही छोड़ दिया.
समझौते करते करते जीवन का रुख ही मोड़ दिया.
कुछ सपने लम्हों ने तोड़े, कुछ तोड़े हालातों ने.
कुछ हमने खुद ही छोड़ दिए, कुछ तोड़े रिश्ते नातों ने.
छूट गया जीवन का सम्बल, बचा नहीं कुछ खोने को.
धृष्ट मनोबल फिर भी देता नवीन स्वप्न संजोने को.
हैं सपने थोड़े छोटे, खुद को साबित कर पाने के.
आसमान तक ना पहुँचे तो उच्च शिखर तक जाने के.
अनदेखा भविष्य है फिर भी क्यों कोई रोके मुझको.
गति मन्थर है, दुर्गम पथ है. जीवन मेरा, क्या तुझको?

Friday, 6 January 2012

मैं लिखती हूँ जब........

मैं लिखती हूँ जब मेरा मन चंचल व्याकुल हो जाता है.
मेरे दिमाग को फुसलाकर ये इधर उधर भटकाता है.

कितनी बातें मन कहता है, ना जाने कहाँ विचरता है.
सीमा, बंधन और रस्मों के रोके से कहाँ ठहरता है.
लिखकर इसको बहलाती हूँ, कुछ आशाएं दिखलाती हूँ.
और कभी कभी इन आशाओं के संग खुद को पा जाती हूँ.
मैं लिखती हूँ जब जीवन-पथ नैराश्य-तमस में जाता है.
मैं लिखती हूँ जब मेरा मन चंचल व्याकुल हो जाता है.

कुछ सपनों जैसे सपने हैं, कुछ सच्चाई सी बातें हैं.
कुछ सुखद सुनहरी सुबहें हैं, कुछ अंधकारमय रातें हैं.
खुश हो जाती हूँ कभी और फिर मुक्त कंठ से गाती हूँ.
और कभी कभी भ्रम में पड़कर केवल लेखनी चलाती हूँ.
मैं लिखती हूँ कोरा कागज़ जब खुद को कोरा पाता है.
मैं लिखती हूँ जब मेरा मन चंचल व्याकुल हो जाता है.

ये मन अतीत की कहता है, थोडा भविष्य बतलाता है.
आँखों को आँसू, होंठों को मुस्कान कभी दे जाता है.
आँसू, मुस्कान सभी मेरे, आनन्दित मुझको करते हैं.
मेरे सुख दुःख के साथी हैं, विश्वास दिलाया करते हैं.
मैं लिखती हूँ जब वर्तमान का राक्षस मुझे डराता है.

मैं लिखती हूँ जब मेरा मन चंचल व्याकुल हो जाता है.
मेरे दिमाग को फुसलाकर ये इधर उधर भटकाता है.

Friday, 25 November 2011

दूरियाँ

हो जाएँ दूरियाँ तो कितने ग़म हो जाते हैं.
ख़ुश रह भी लेते हैं, ख़ुश हो भी नहीं पाते हैं.

हम तो रह के भी दूर पास सबके रहते हैं.
न जाने कैसे इतने फ़ासले हो जाते हैं.

किसी की बात को बिन बोले समझ लेते हैं.
किसी को चाह के भी समझ नहीं पाते हैं.

राह हो कितनी भी लम्बी चले हैं बिन बोले.
न जाने आज क्यूँ ये पाँव थके जाते हैं.

दिलों को जीत लिया करते थे हम पल भर में.
आज ढूंढा तो अपना दिल ही नहीं पाते हैं.

मुश्किलें लाख हों हम पायेंगे तुझे मंजिल!
मुश्किलों से बड़े गहरे हमारे नाते हैं.

हो जाएँ दूरियाँ तो कितने ग़म हो जाते हैं.
ख़ुश रह भी लेते हैं, ख़ुश हो भी नहीं पाते हैं.

Tuesday, 8 November 2011

मैं ही मैं को पा जाऊं

जी करता है खट्टी मीठी यादों में गुम हो जाऊं ,
कोई खोज न पाए मुझको बस मैं ही मैं को पा जाऊं.

उस बचपन में जाकर माँ के आँचल में फिर छिप जाते. 
और हाथ पकड़कर नाना का हम चाट बताशे खाते.
कंधे पर चढ़कर पापा के मैं फिर अम्बर को पाऊं.
कोई खोज न पाए मुझको बस मैं ही मैं को पा जाऊं.

जाते थे विद्यालय पढने और यारों से मिलते थे.
थी कहाँ पढाई, बस उल्टी सीधी बातें करते थे.
उन छोटी छोटी बातों पर फिर जी भर के हँस पाऊं.
कोई खोज न पाए मुझको बस मैं ही मैं को पा जाऊं.

और कैंटीन में जाकर के वो रोज़ समोसे खाना.
पकडे जाने पर यारों के संग धूप में सजा पाना.
और छुट्टी होते ही फिर से भागो भागो चिल्लाऊं.
कोई खोज न पाए मुझको बस मैं ही मैं को पा जाऊं.

जीते थे हर पल को खुल के, थी ना चिंता जीवन की.
सबकी बातें सुन लेते थे, करते थे अपने मन की.
जो होगा वो तो होगा ही, क्यूँ आज बिगाड़े जाऊं.
कोई खोज न पाए मुझको बस मैं ही मैं को पा जाऊं.

लगता था तब कि ये जीवन हँसते हँसते बीतेगा.
हम सबसे अच्छे हैं, कैसे कोई हमसे जीतेगा.
"सब संभव है गर चाहें" यह विश्वास दोबारा पाऊं.
कोई खोज न पाए मुझको बस मैं ही मैं को पा जाऊं.

Friday, 23 September 2011

आँसू

सुना था ऐसा कि आँसू है कमज़ोरी की एक निशानी,
कभी किसी ने देखा है क्या वीरों की आँखों में पानी.
फिर क्यूँ दुःख में और सुख में भी रोते हैं कितने ही जन,
क्या उनकी वीरता खो गयी या कायर है उनका मन?
बहुत है सोचा बहुत विचारा, क्या मैं भी कमज़ोर हो गयी,
कभी कभी तो हुआ है यूँ भी रोते रोते भोर हो गयी.
मैंने पूछा हर आँसू से रहते हो तुम मेरे संग,
दुःख में चल देते हो जैसे कभी नहीं थे मेरे अंग.
वो बोला मैं तेरा जाया तुझे बताने आया हूँ,
तेरे आँखों की कालिख को खुद से धोने आया हूँ.
हर आँसू दे गया मुझे एक नया भरोसा नवीन आस,
कहता था ये रात गयी अब सुबह सुनहरी बहुत है पास.
जिस आँसू को सबने माना निर्बल कायर और अधीर,
वह तो धीरज का प्रतीक है, सबसे निश्छल सबसे वीर.
उस छोटे से मोती का अस्तित्व ख़त्म हो जाता है,
तब जाकर मानव का मन अपनी निर्मलता पाता है.