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Wednesday, 16 May 2012

अंतर्द्वंद

चाहत है मेरी चलने की इस दुनिया के संग|
कार्य करू सामाजिक, बनकर इसी विश्व का अंग|
जितना ही लोगों के मन के अधिक निकट जाती हूँ
उतना खुद को भरी भीड़ में एकाकी पाती हूँ|
कहते हैं सब मैं लोगों से बातें कम करती हूँ|
सबके मन की सुन लेती, खुद की कुछ ना कहती हूँ|
अपने दिल की खुद से कहकर जो सुकून है पाया
उस दिल के अपनेपन को कोई समझ कहाँ है पाया|
शब्द नहीं हैं उतने, जितने भाव हैं मेरे मन में|
खुद ही खुद की सुन पाऊं, काफी है इस जीवन में|
कभी मैं कुछ कहती हूँ, कुछ कहती है मेरी छाया|
मैं कहती हूँ सच है वो कहती है सब है माया|
हैं जो रिश्तों के ये बंधन, अपने और पराये|
कोई इनके मोह-पाश से कैसे बचकर जाए?
कभी कभी द्वंदों में फंसकर खुद को बहुत है कोसा|
छाया की बातों पर, या फिर खुद पर करूँ भरोसा?
छाया भी तो मेरे मन की बातें ही कहती है|
मेरे ही मन के छोटे से कोने में रहती है|

4 comments:

  1. Bilkul bharosa rakhiye khud par... itni selfless soch hai, toh mukaam zaroor haasil hogi.

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