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Saturday, 30 August 2014

विषाद

बहुत हो गया पाकर खोना, बहुत हो गया विषम विषाद।
विष पीकर भी सम को पाना, इतना ही है रखना याद।

खड्ग द्विपक्षी बन निकली है यह अन्तर की आग दोगली।
जलकर कटी या कटकर जल गयी नश्वर जग की छवि रुपहली?
बर्बादी के बाद हो रहा प्रणव-प्रकाश-मनन आबाद।
विष पीकर भी सम को पाना, इतना ही है रखना याद। 

Monday, 26 May 2014

भटक रही है यूँ ही नज़र

बैठे हैं यूँ एकाकी से, ढूंढ रहे कुछ इधर उधर।
किसको देखें, क्या ना देखें, भटक रही है यूँ ही नज़र।

चक्कर में पड़कर के सारे, चलते फिरते लोग यहाँ।
खड़ा है कोई, बैठा कोई, घूमे कोई यहाँ वहाँ।
सबके अपने किस्से हैं, सब अलग कहानी कहते हैं।
सबको ये ही लगता, केवल वो ही मुश्किल सहते हैं।
ईश्वर इनसे मुझे बचा लो, ढूँढू तुमको किधर किधर।
किसको देखें, क्या ना देखें, भटक रही है यूँ ही नज़र। 

Thursday, 22 May 2014

क्या करना बाकी है.

इस जीवन के मूल्य अभी समझना बाकी है
क्या करते, क्यों करते और क्या करना बाकी है.

ईश्वर के बच्चे हैं हम ऐसा सब कहते हैं.
वो ही सबके हृदयों में छिपकर के रहते हैं.
अपने ही दिल में बस खुद से जाना बाकी है.
क्या करते, क्यों करते और क्या करना बाकी है.

बंधन में बंधकर ये मन भागे ही जाता है.
मोह, लोभ और क्रोध लिए दिल को भटकाता है.
चञ्चल, मूरख मन को वश में लाना बाकी है.
क्या करते, क्यों करते और क्या करना बाकी है.

दुष्कर हो चलना तब वो ही राह दिखाता है.
मानव कष्टों से लड़कर मंज़िल को पाता है.
राह मिल गयी है, बस मंज़िल पाना बाकी है.
क्या करते, क्यों करते और क्या करना बाकी है.